मंगलवार, 19 जून 2018

सुल्तान मोहित वाजपेयी के एक लघुकथा

ज़ंज़ीरे

नयी बहू आज पहली बार ब्याहकर ससुराल आयी थी..,बहुत सारा दहेज लेकर,सोना- चांदी,और बहुत सारी नोटों की गड्डियां..
दिन भर नयी बहू को देखेंने आने की औपचारिकता चलती रही नाते-रिश्तेदार आये,पास-पड़ोसी आये... दिन कटा...
रात को दूल्हा जा ही पाया था नयी बहु के पास की बाहर से आवाज आयी-"अरे छुटके जरा यहाँ तो आ..!देख तो कितना-कुछ लायी है..!"
दूल्हा कमरे के बाहर चला गया..!नयी बहू उससे कुछ कहना चाह रही थी..शायद..नही कह पायी..!
एक घंटा हो गया,और अब दो घंटे..?अचानक नयी बहू को हार्ट अटैक का जबर्दरस्त दौरा पड़ा..? उसकी आखिरी सासे सुहागरात की सेज पर ही अनन्त की और चल रही थी..!

उसने कई बार आवाज़ दी,पास बुलाने का भरभस प्रयास किया वो नही आये..?सारे लोग एक साथ बैठे बेटे , भाई ,भतीजे ,ऒर भांजे की शादी का जश्न मना रहे थे..और दहेज में मिली गड्डियों की नोटे गिन रहे थे..!

दूल्हे ने बीच-बीच कहा भी -माँ वो बुला रही है ..!शायद उसकी तबियत...?
"बस थोड़ा रुक..ये आखिरी गड्डी है..!"माँ ने कहा..!
मगर तब तक उसकी आखिरी सांस भी जा चुकी थी..!!

सुल्तान मोहित वाजपेयी की एक कविता

बेबसी

सात समुंदर पार का
एक महुए का पेड़
जिसकी कुछ पत्तियां समुन्दर की लहरों में
बहके आती हैं इधर

मदरसे में बच्चों को देखता
मदरसे के बाहर कांच बीनता बच्चा
जिसके अरमान बहके जाते है
मास्साब के ब्लैक बोर्ड तक
उसी तरह

जिसकी आंखों में , कभी
झाँककर नही देखा

परसो तालाब में डूब रहा था एक बच्चा
कह रहा था, चीख रहा था
बचाओ-बचाओ
किसी ने नही बचाया

सब जानते थे कि वो झूठ बोल रहा था
मगर अब वो वास्तव में डूब
चुका था,हमने देखा था..
उसकी आँखों मे दम तोड़ता सपना

जो अपना नाम दिन में पांच बार लिखता
साफ़-साफ़ ज़मीन पर
क्योकि उसने अब तक अपना नाम
लिखना ही सीखा था
फिर कलम की जगह
पकड़ा दिया गया एक बोरिया

काँच बीनने के लिए
डूबता हुआ,मदरसे में झांकता हुआ
बहके मास्साब के ब्लैक बोर्ड तक जाने के लिए
हमेसा , अनवरत.....

                        -सुल्तान मोहित वाजपेयी

डायरी

कितना सुरम्य बातावरण है ।आज सुबह जब मेरे घर पर शौचालय निर्माण का काम हो रहा था ।करीब दस बजे झमाझम बरसात होने लगी ।
शीतल पवन के झोके,मिटटी को तर कर रहे है।
सुबह जब सूरज  उगता है,पेड़ संगीत के तरह गाने लगते है।
नदी जब माँजी को पुकारती है तब राते पलाश के पत्ते पर सवार होकर रेत पर सोने लगते है।
   यह धीरे धीरे एक नयी सुबह की शुरुवात है।
धूप से सूखी दूब,नयी सड़क पर पहली बरसात में एकदम से ताज़ी हो गयी है और सड़के धुल कर साफ़ हो गयी है।

रात 12 बजे---

शांत  है आकाश,धरती,
शांत है पाताल ,पानी,
शांत है वायु,कमल दल,शांत
शांत है काली घटाए,शांत
दूर उल्लू बोलता है
दूर जुगनो  दीपदीपते,
शांत कोई गा रहा है
साखी कबीरा की,
शांत होकर शांत
गिर रही है बूँद पत्तो पर
शांत एकदम शांत

एक कविता पक रही है------

इस अँधेरे से मैं ऊब गया हूँ।चाहता हूँ क़ि एक ढिबरी को जला कर रख लूँ।
गीले बादल, आ कर काप गए है।
ओस गिर रही है
और मैं भी इस तरह से रात भर जग रहा हूँ।
                               - माध्यन्दिन

रात सो रही है

 सघनता के बीच में

अँधेरा फैला है

अति बारीक महीन

उजला है आकाश अनन्त सा

नक्षत्र सो रहे है

नदी में ओढ़े नीला वर्ण

धरती सो रही है

पेड़ो पर सिर रख कर

अर्धरात्रि सघन है

रविवार, 14 जनवरी 2018

भगीरथ कानोडिया की एक लोक कथा


बुआजी की आंखें / भागीरथ कानोडिया

प्रद्युम्नसिंह नाम का एक राजा था। उसके पास एक हंस था। राजा उसे मोती चुगाया करता और बहुत लाड़-प्यार से उसका पालन किया करता। वह हंस नित्य प्रति सायंकाल राजा के महल से उड़कर कभी किसी दिशा में और कभी किसी दिशा में थोड़ा चक्कर काट आया करता।

एक दिन वह हंस उड़ता हुआ नीवनजी की छत पर जा बैठा। उकी पुत्रवधु गर्भवती थी। उसने सुन रखा था कि गर्भावस्था में यदि किसी स्त्री को हंस का मांस खाने को मिल जाय तो उसकी होने वाली संतान अत्यंत मेधावी, तेजस्वी और भाग्यशाली होती है। अनायास ही छत पर हंस आया देखकर उसके मुंह में पानी भर आया। उसने हंस को पकड़ लिया ओर रसोईघर में ले जाकर उसे पकाकर खा गई। इस बात का पता न उसने अपनी सास को लगने दिया, न ससुर को और न पति को ही, क्योंकि उसे भय था कि अगर राजा को इस बात का सुराग लग गया तो बड़ा अनिष्ट हो जायगा।

उधर जब रात होने पर हंस राजमहल में नहीं पहुंचा तो राजा-रानी को बहुत चिंता हुई। उनका मन आकुल-व्याकुल होगया। चारों ओर उसकी खोज में आदमी दौड़ाये गए। लेकिन हंस कहीं हो तब मिले न! राजा ने अड़ोस-पड़ोस के शहरों-कस्बों में भी सूचना कराई कि अगर कोई हंस का पता लगा सके तो राज्य की ओर से उसे बहुत बड़ा पुरस्कार दिया जायगा।

दस-बीस दिन निकल गये। कुछ भी पता नहीं लग सका। चूंकि वह हंस राजा ओर रानी को बहुत प्रिय था, अत: वे उदास रहने लगे। एक दिन एक कुटटनी राजा के पास आई और बोली कि वह हंस का पता लगा सकती है, लेकिन उसे थोड़ा-सा समय चाहिए।

राजा ने कहा, "मेरे राज्य के पंडित-जयोतिषी, हाकिम-हुक्काम और मेरे इतने सारे गुप्तचरों में कोई भी पता नहीं लगा सका, तुम कैसे पता लगा सकोगी?"

कुटटनी ने कहा, "मुझे अपनी योग्यता पर विश्वास है। अगर अन्नदाता का हुक्म हो तो एक बार आकश के तारे भी तोड़कर ले आऊं। आप मुझे थोड़ा-सा समय दीजिए और आवश्यक धन दे दीजिय। उसे वापस ला सकूं या नहीं, लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाती हूं कि उसका अता-पता आवश्य ले आऊंगी।"

राजा ने स्वीकार कर लिया और कुटअनी अपने उद्देश्य की सिद्वि के लिए चल पड़ी।

सबसे पहले कुटटुनी ने यह पता लगाया कि शहर के धनिक घरों में कौन-कौन स्त्री गर्भवती हैं। उसे पता था कि गर्भावस्था में किसी स्त्री को यदि हंस का मांस मिल जाय तो वह बिना खाये नहीं रहेगी। साथ ही यह भी जनती थी कि साधारण घर की कोई स्त्री राजा का हंस पकड़ने का साहस नहीं कर सकती।

खोजते-खोजते उसे पता लगा कि दीवान की पुत्रवधू गर्भवती है। अत: उसके मन में संदेह हो गया कि हो सकता है, राजा का हंस उड़ते-उड़ते किसी दिन इनके घर की छत पर आ गया हो और गर्भावस्था में होने के कारण लोभवश यह स्त्री उसे खा गई हो।

कुटटनी ने सोचा, किसी भी स्त्री के साथ निकटस्थ मैत्री करने के लिए उसके पीहर के हालचाल जानना आवश्यक है। इसलिए कुटटनी उसके पीहर के गांव पहुंची। वहां जाकर उसने पहरवाले सारे लोगों के नाम-धाम तथा उनके घर में बीती हुई खास-खास पुरानी घटनाओं की जानकारी ली। उसे पता लगा कि दीवानजी की पुत्रवधू की बूआ छोटी उम्र में ही किसी साधु के साथ चली गई थी और आज तक लौटकर नहीं आई है। उसने सोचा, अब दीवानजी के घर जाकर उनकी पुत्रवधू की बुआ बनकर भेद लेने का अच्छा अस्त्र अपने हाथ आ गया।

वह दीवनजी के घर गई। उनकी पुत्रवधू के साथ बहुत स्नेह-ममत्व की बात करने लगी और बोली; "बेटी, मैं तेरी बुआ हूं। हम दोनों आज पहली बार मिली हैं। तुम जानती ही हो कि मैं तो बहुत पहले घर छोड़कर एक साधु के साथ चली गई थी। हल ही में घर लौटकर आयी और भाई से मिली तो उसने बताया कि तुम यहां ब्याही गई हो और तुम्हारे ससुर राज्य के दीवान हैं। यह जानकर मन में तुमसे मिलने की बहुत उत्कंठा हुई तो यहां चली आई। तुम्हें देखकर मेरे मन में बहुत ही हर्ष हुआ। भगवान तुम्हें सुखी रखें और तुम्हारी कोख से एक कांतिवान तेजस्वी पुत्र पैदा हो। मैं परसों वापस जा रही हूं और तुम्हारे लड़का होने के बाद भाई-भाभी को साथ लेकर बच्चे को देखने और उसका लाड़-चाव करने यहां आऊंगी।"

दीवान की पुत्रवधू ने अपने भोलपन के कारण उसकी बातों का विश्वास करलिया और बोली, "बुआजी, आप आई हैं तो दस-बीस दिन तो यहां रहिए। जाने की इतनी जल्दी भी क्या पड़ी है!"

बुआ बनी हुई कुटअनी को और क्या चाहिए था ! उसने वहां रहना स्वीकार कर लिया। थोड़े ही दिनों में बुआ-भतीजी खूब हिल-मिल गईं। एक दिन बातों-ही बातों में बुआजी ने कहा, "बेटी, गर्भावस्था में किसी स्त्री को अगर हंस का मांस खाने को मिल जाय तो बहुत अच्छा परिणाम निकलता है। उसके प्रभाव से होनेवाली संतानबहुत ही तेजस्वी और कांतिवान होती है; किंतु हंस तो मानसरोवर छोड़कर और कहीं होते नहीं, इसलिए यह काम पार पड़े तो कैसे पड़े !"

यह सुनकर उसने अपने हंस खाने की बात बुआजी को सहजभाव से बता दी। सुनकर बुआ ने कहा, "बेटी, यह अचरज की बात है कि तुम्हारे यहां राजा के पास हंस था ! तुमने जो कुछ किया, वह बहुत अच्छा किया; किन्तु तुम्हें किसी के सामने इस घटना का जिक्र नहीं करना चाहिए। मेरे सामने भी नहीं करना था। लेकिन खैर, मुझसे कही हुई बात तो कहीं जाने वाली नहीं है, इसलिए जिक्र कर दिया तो भी कोई बात नहीं!˝

कुछ दिन और बती गये, तब कुटटनी ने कहा, "बेटी, अगर भगवान के सामने तुम हंस खाने की बात स्वीकार कर लो तो हंस की हत्या का पाप तो सिर से उतर ही जायगा, सुपरिणाम भी द्विगुणित होगा। मंदिर के पुजारी से कहकर मैं ऐसी व्सवस्था कर दूंगी कि जिस वक्त वहां तुम सारी घटना बताकर अपराध स्वीकार करो, उस वक्त पुजारी भी वहां नहीं रहे तथा और भी कोई न रहे, हम दो ही रहेंगी।˝

उसने ऐसा करना स्वीकार कर लिया।

कुटटनी लुक-छिपकर राजा के पास पहुंची और बोली, "आपसे वायदा किया था, उसके अनुसार हंस का अता-पता लगा लाई हूं।˝ ऐसा कहकर उसने सारी घटना राजा को बताई।

राजा ने कहा, "इसका प्रमाण क्या है?˝

वह बोली, "फलां दिन आप मंदिन में आ जायं और हंस खाने वाली स्त्री की स्वीकारोक्ति स्वयं अपने कानों सुन लें।˝

राजा ने ऐसा करने की ‘हां’ भर ली।

नियत दिनसमय से कुछ पहले पूर्व-योजना के अनुसार कुटटनी ने राजा को एक जरा ऊंचे स्थान पर रखे हुए एक बड़े-से ढोल में छिपा दिया और बुआ-भतीजी मंदिर पहुंचीं।

मंदिर का पट खुला था। पुजारी या और दूसरा कोई भी व्यक्ति वहां नहीं था। अब बुआजी ने शुरू किया, "हां, तो बेटी क्या बात हुई थी उस दिन?˝

दीवानकी पुत्रवधू ने घटना आरम्भ की। वह थोड़ी-सी घटना ही कह पाई थी कि कुटटनी ने सोचा, राजा ध्यानपूर्वक सुन तो रहा है न, इसलिए वह ढोल की तरफ इशारा करके बोली, "ढोल रे ढोल, सुन रे बहू का बोल।˝

उसका इतना कहना था कि भतीजी का माथा ठनका। उसे वहम हो गया कि हो न हो, दाल में कुछ काला है। मालूम होता है, मैं तो ठगी गई हूं। वह चुप हो गई।

बुआ बोली; "हां तो बेटी, आगे क्या हुआ ?˝

इस पर भतीजी बोली, "उसके बाद तो बुआजी मेरी आंख खुल गयी, सपना टूट गया।"

ज्योंही भतीजी की आंख खुली, त्योंही बुआजी की आंखें भी खुली-की-खुली रह गईं। उसके पांव तो भतीजी से भी भारी हो गये और उसके लिए उठकर खड़े होना भी मुश्किल हो गया।

लक्ष्मीनिवास बिड़ला की एक लोक कथा


चोर और राजा / लक्ष्मीनिवास बिडला

किसी जमाने में एक चोर था। वह बडा ही चतुर था। लोगों का कहना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उडा सकता था। एक दिन उस चोर ने सोचा कि जबतक वह राजधानी में नहीं जायगा और अपना करतब नहीं दिखायगी, तबतक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी। यह सोचकर वह राजधानी की ओर रवाना हुआ और वहां पहुंचकर उसने यह देखने के लिए नगर का चक्कर लगाया कि कहां कया कर सकता है।

उसने तय कि कि राजा के महल से अपना काम शुरू करेगा। राजा ने रातदिन महल की रखवाली के लिए बहुतसे सिपाही तैनात कर रखे थे। बिना पकडे गये परिन्दा भी महल में नहीं घुस सकता था। महल में एक बहुत बडी घडीं लगी थी, जो दिन रात का समय बताने के लिए घंटे बजाती रहती थी।

चोर ने लोहे की कुछ कीलें इकठटी कीं ओर जब रात को घडी ने बारह बजाये तो घंटे की हर आवाज के साथ वह महल की दीवार में एकएक कील ठोकता गया। इसतरह बिना शोर किये उसने दीवार में बारह कीलें लगा दीं, फिर उन्हें पकड पकडकर वह ऊपर चढ गया और महल में दाखिल हो गया। इसके बाद वह खजाने में गया और वहां से बहुत से हीरे चुरा लाया।

अगले दिन जब चोरी का पता लगा तो मंत्रियों ने राजा को इसकी खबर दी। राजा बडा हैरान और नाराज हुआ। उसने मंत्रियों को आज्ञा दी कि शहर की सडकों पर गश्त करने के लिए सिपाहियों की संख्या दूनी कर दी जाय और अगर रात के समय किसी को भी घूमते हुए पाया जाय तो उसे चोर समझकर गिरफतार कर लिया जाय।

जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था, एक नागरिक के भेष में चोर मौजूद था। उसे सारी योजना की एक एक बात का पता चल गया। उसे फौरन यह भी मालूम हो यगा कि कौन से छब्बीस सिपाही शहर में गश्त के लिए चुने गये हैं। वह सफाई से घर गया और साधु का बाना धारण करके उन छब्बीसों सिपाहियों की बीवियों से जाकर मिला। उनमें से हरेक इस बात के लिए उत्सुक थी कि उसकी पति ही चोर को पकडे ओर राजा से इनाम ले।

एक एक करके चोर उन सबके पास गया ओर उनके हाथ देख देखकर बताया कि वह रात उसके लिए बडी शुभ है। उसक पति की पोशाक में चोर उसके घर आयेगा; लेकिन, देखो, चोर की अपने घर के अंदर मत आने देना, नहीं तो वह तुम्हें दबा लेगा। घर के सारे दरवाजे बंद कर लेना और भले ही वह पति की आवाज में बोलता सुनाई दे, उसके ऊपर जलता कोयला फेंकना। इसका नतीजा यह होगा कि चोर पकड में आ जायगा।

सारी स्त्रियां रात को चोर के आगमन के लिए तैयार हो गईं। अपने पतियों को उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी। इस बीच पति अपनी गश्त पर चले गये और सवेरे चार बजे तक पहरा देते रहे। हालांकि अभी अंधेरा था, लेकिन उन्हें उस समय तक इधर उधर कोई भी दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सोचा कि उस रात को चोर नहीं आयगा, यह सोचकर उन्होंने अपने घर चले जाने का फैसला किया। ज्योंही वेघर पहुंचे, स्त्रियों को संदेह हुआ और उन्होंने चोर की बताई कार्रवाई शुरू कर दी।

फल वह हुआ कि सिपाही जल गये ओर बडी मुश्किल से अपनी स्त्रियों को विश्वास दिला पाये कि वे ही उनके असली पति हैं और उनके लिए दरवाजा खोल दिया जाय। सारे पतियों के जल जाने के कारण उन्हें अस्पताल ले जाया गया। दूसरे दिन राजा दरबार में आया तो उसे सारा हाल सुनाया गया। सुनकर राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने कोतवाल को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर चोर पकड़े।

उस रात कोतवाल ने तेयार होकर शहर का पहरा देना शुरू किया। जब वह एक गली में जा रहा रहा था, चोर ने जवाब दिया, ‘मैं चोर हूं।″ कोतवाल समझा कि लड़की उसके साथ मजाक कर रही है। उसने कहा, ″मजाक छाड़ो ओर अगर तुम चोर हो तो मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें काठ में डाल दूंगा।″ चोर बाला, ″ठीक है। इससे मेरा क्या बिगड़ेगा!″ और वह कोतवाल के साथ काठ डालने की जगह पर पहुंचा।

वहां जाकर चोर ने कहा, ″कोतवाल साहब, इस काठ को आप इस्तेमाल कैसे किया करते हैं, मेहरबानी करके मुझे समझा दीजिए।″ कोतवाल ने कहा, तुम्हारा क्या भरोसा! मैं तुम्हें बताऊं और तुम भाग जाओं तो ?″ चोर बाला, ″आपके बिना कहे मैंने अपने को आपके हवाले कर दिया है। मैं भाग क्यों जाऊंगा?″ कोतवाल उसे यह दिखाने के लिए राजी हो गया कि काठ कैसे डाला जाता है। ज्यों ही उसने अपने हाथ-पैर उसमें डाले कि चोर ने झट चाबी घुमाकर काठ का ताला बंद कर दिया और कोतवाल को राम-राम करके चल दिया।

जाड़े की रात थी। दिन निकलते-निकलते कोतवाल मारे सर्दी के अधमरा हो गया। सवेरे जब सिपाही बाहर आने लगे तो उन्होंने देखा कि कोतवाल काठ में फंसे पड़े हैं। उन्होंने उनको उसमें से निकाला और अस्पताल ले गये।

अगले दिन जब दरबार लगा तो राजा को रात का सारा किस्सा सुनाया गया। राजा इतना हैरान हुआ कि उसने उस रात चोर की निगरानी स्वयं करने का निश्चय किया। चोर उस समय दरबार में मौजूद था और सारी बातों को सुन रहा था। रात होने पर उसने साधु का भेष बनाया और नगर के सिरे पर एक पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठ गया।

राजा ने गश्त शुरू की और दो बार साधु के सामने से गुजरा। तीसरी बार जब वह उधर आया तो उसने साधु से पूछा कि, ″क्या इधर से किसी अजनबी आदमी को जाते उसने देखा है?″ साधु ने जवाब दिया कि "वह तो अपने ध्यान में लगा था, अगर उसके पास से कोई निकला भी होगा तो उसे पता नहीं। यदि आप चाहें तो मेरे पास बैठ जाइए और देखते रहिए कि कोई आता-जाता है या नहीं।″ यह सुनकर राजा के दिमाग में एक बात आई और उसने फौरन तय किया कि साधु उसकी पोशाक पहनकर शहर का चक्कर लगाये और वह साधु के कपड़े पहनकर वहां चोर की तलाश में बैठे।

आपस में काफ बहस-मुबाहिसे और दो-तीन बार इंकार करने के बाद आखिर चोर राजा की बात मानने को राजी हो गया ओर उन्होंने आपस में कपड़े बदल लिये। चोर तत्काल राजा के घोड़े पर सवार होकर महल में पहुंचा ओर राजा के सोने के कमरे में जाकर आराम से सो गया, बेचारा राजा साधु बना चोर को पकड़ने के लिए इंतजार करता रहा। सवेरे के कोई चार बजने आये। राजा ने देखा कि न तो साधु लौटा और कोई आदमी या चोर उस रास्ते से गुजरा, तो उसने महल में लौट जाने का निश्चय किया; लेकिन जब वह महल के फाटक पर पहुंचा तो संतरियों ने सोचा, राजा तो पहले ही आ चुका है, हो न हो यह चोर है, जो राजा बनकर महल में घुसना चाहता है। उन्होंने राजा को पकड़ लिया और काल कोठरी में डाल दिया। राजा ने शोर मचाया, पर किसी ने भी उसकी बात न सुनी।

दिन का उजाला होने पर काल कोठरी का पहरा देने वाले संतरी ने राजा का चेहरा पहचान लिया ओर मारे डर के थरथर कांपने लगा। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा। राजा ने सारे सिपाहियों को बुलाया और महल में गया। उधर चोर, जो रात भर राजा के रुप में महल में सोया था, सूरज की पहली किरण फूटते ही, राजा की पोशाक में और उसी के घोड़े पर रफूचक्कर हो गया।

अगले दिन जब राजा अपने दरबार में पहुंचा तो बहुत ही हतरश था। उसने ऐलान किया कि अगर चोर उसके सामने उपस्थितित हा जायगा तो उसे माफ कर दिया जायगा और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कीह जायगी, बल्कि उसकी चतुराई के लिए उसे इनाम भी मिलेगा। चोर वहां मौजूद था ही, फौरन राजा के सामने आ गया ओर बोला, "महाराज, मैं ही वह अपराधीह हूं।″ इसके सबूत में उसने राजा के महल से जो कुछ चुराया था, वह सब सामने रख दिया, साथ ही राजा की पोशाक और उसका घोड़ा भी। राजा ने उसे गांव इनाम में दिये और वादा कराया कि वह आगे चोरी करना छोड़ देगा। इसके बाद से चोर खूब आनन्द से रहने लगा।