कितना सुरम्य बातावरण है ।आज सुबह जब मेरे घर पर शौचालय निर्माण का काम हो रहा था ।करीब दस बजे झमाझम बरसात होने लगी ।
शीतल पवन के झोके,मिटटी को तर कर रहे है।
सुबह जब सूरज उगता है,पेड़ संगीत के तरह गाने लगते है।
नदी जब माँजी को पुकारती है तब राते पलाश के पत्ते पर सवार होकर रेत पर सोने लगते है।
यह धीरे धीरे एक नयी सुबह की शुरुवात है।
धूप से सूखी दूब,नयी सड़क पर पहली बरसात में एकदम से ताज़ी हो गयी है और सड़के धुल कर साफ़ हो गयी है।
रात 12 बजे---
शांत है आकाश,धरती,
शांत है पाताल ,पानी,
शांत है वायु,कमल दल,शांत
शांत है काली घटाए,शांत
दूर उल्लू बोलता है
दूर जुगनो दीपदीपते,
शांत कोई गा रहा है
साखी कबीरा की,
शांत होकर शांत
गिर रही है बूँद पत्तो पर
शांत एकदम शांत
एक कविता पक रही है------
इस अँधेरे से मैं ऊब गया हूँ।चाहता हूँ क़ि एक ढिबरी को जला कर रख लूँ।
गीले बादल, आ कर काप गए है।
ओस गिर रही है
और मैं भी इस तरह से रात भर जग रहा हूँ।
- माध्यन्दिन
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।