सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

चीजों को देखने में बड़ा अंतर है

चीजों को देखने में बड़ा अंतर है 

यौवन में 
नहीं ठहर पाता प्रेम, 
कि प्रेम!  
फिसल कर 
धप्प से आ गिरता है बचपन की कोमल स्मृतियों में, 
शायद इसलिए कि - 
बहुत छुटपन के दिनों में 
किसी पोटली में 
विश्वास जैसी कोई चमकीली चीज़  
वहां... 
गुलमोहर के रंगों के बीच 
सुरक्षित बची रह गई होगी 

चीजों को निहारने में बड़ा अंतर है 
बचपन और यौवन में,  
कि प्यार! 
प्यार नहीं रहता ;  
अजनबीपन चक्कर कटाता है 
उम्र भर 
अन्जान राहों पर,  
जैसे -  
यौवन में प्रेम  
केवल परिकल्पनाओं में पनपता है  
और... 
कुछ ही क्षणों में 
ढह जाता है, 
कि ! 
नहीं छू पा सकती 
कोई बेल इसकी  
वास्तविकता का कोई छोर और जैसे... 
- एक दुष्ट छाया 
कोई धारदार हथियार लिए बैठी है 
बस प्रेम ही को कतरनें के लिए। 

               •रोज़लीन

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

कैलाश मनहर की एक कविता

वे इतने अच्छे हैं 
कि स्वयं को शिखर तक ले जाने के लिये 
वे हत्यायें भी करवा सकते हैं 
अपने ही साथियों की 
और देशभक्ति का मिथ्या राग रंभाते हुये
बेच सकते हैं समृद्ध देश के
तमाम संसाधन 

वे इतने वीर हैं 
कि क़ानूनन मिली सज़ा से 
बचने के लिये बार बार माफ़ी मांग सकते हैं 
और विवादास्पद ढाँचे को तोड़ने की 
हुँकार और इन्कार एक साथ 
कर सकते हैं 

वे इतने विद्वान हैं 
कि गोरखनाथ,रैदास और विवेकानन्द को 
एक धूणे का तपस्वी बता सकते हैं 
और मरते हुये रावण से सुशासन की विधि पूछने 
भरत को भेज सकते हैं और 
पाण्डवों का अस्त्रालय बता कर 
ऑस्ट्रेलिया को प्राचीन भारत का हिस्सा 
बता सकते हैं 

वे इतने सच्चे हैं 
कि अपनी सरकार बनते ही 
महंगाई कम करने और 
दो करोड़ युवाओं को नौकरी देने 
और गंगा को निर्मल न करने पर जल समाधि लेने 
और नोटबंदी से आतंकवाद की 
कमर टूटने के वायदों पर 
दृढ़ बने रहते हैं 

वे इतने त्यागी हैं कि 
घर-परिवार त्याग कर 
धर्मांधता फैलाने के लिये कटिबध्द रहते हुये 
सत्ता में आने के लिये सदैव संघर्षरत रह कर 
अन्तत: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पद सगर्व 
सुशोभित करते हैं 

वे इतने देशभक्त हैं 
कि देश के समस्त संसाधनों को 
बेचते हुये विकास के नाम पर 
धनिकों की तिज़ौरियाँ भरवाते हैं 
और देश के नागरिकों की हत्यायें 
भी करते हुये छप्पन इँची 
सीना फुलाये जाते हैं 

वे सर्वगुण सम्पन्न हैं 
दुष्ट छद्मी कि अधिकाँश देश और समाज 
बने हुये हैं उनके पिछलग्गू जबकि 
एक समूची सभ्यता मरती जा रही है बस
भ्रमित भावावेश में 
             •कैलाश मनहर 

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

एक

जिसमें राजनीति न हो
ऐसी-सी कविता लिखने के लिए
ज़रूरत है कि-
मैं चिड़ियों को सुन सकूं
और
चिड़ियों को सुनने के लिए
ज़रूरी है कि-
लड़ाकू जहाज़ आवाज़ न करें।
         •मोरवान मखलूक (फिलिस्तीनी कवि)
           (पंजाबी अनुवाद(प्रदीप सिंह,हिसार)
           पंजाबी से हिंदी अनुवाद)

जय चक्रवर्ती की एक ग़ज़ल

दूर फेंक वैचारिकी, दूर फेंक साहित्य।
दरबारों की शान में, पीट तालियाँ नित्य।।

इनकी भी जयकार कर, उनकी भी जयकार।
चेहरे पर हरदम पहन, चेहरे कई हज़ार।।

टुकड़ों की उम्मीद में, धनपशुओं के बीच।
इसकी उसकी शान में, अपने शब्द उलीच।।

नंगे होने से मिले, यदि कोई सौगात।
नंगा हो जा फेंककर, कागज़, कलम, दवात।

लिख चालीसा, आरती, खण्ड काव्य दो-चार।
नंगे राजा को बता, ईश्वर का अवतार।।

इनके-उनके कक्ष में, तू ही सबसे दक्ष।
वक़्त पड़े तो पक्ष में, वक़्त पड़े प्रतिपक्ष।।

दरबारों के गीत लिख, लिख रावण को राम।
दो दो पैसे के लिए, कर खुद को नीलाम।।

पुरस्कार, सम्मान की, रख आँखों में प्यास।
जोड़-तोड़ का नित नया, रचता चल इतिहास।।

                           •जय चक्रवर्ती