गांवकथा
ग्रामीण भावबोध का साहित्यिक मंच
सोमवार, 19 फ़रवरी 2024
चीजों को देखने में बड़ा अंतर है
शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024
कैलाश मनहर की एक कविता
गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024
एक
जय चक्रवर्ती की एक ग़ज़ल
बुधवार, 18 अक्टूबर 2023
रजनी शर्मा 'बस्तरिया' की एक कविता
शनिवार, 14 अक्टूबर 2023
सुमित वाजपेयी'मध्यांदिन'की एक कविताए
चिकनी सतह पर ध्यान दो
आप्तालित मधुमास के, चौमासा से भींगे हुए
ये निलय हैमैं
मै कह रहा हूं,आप से चिकनी सतह पर ध्यान दो.
कोई प्रेम नहीं करता अंधेरे से
सघन बीती रात के,ओश से भींगे हुए
कुछ सत्य और असत्य है
मैं कह रहा हूं आप से चिकनी सतह पर ध्यान दो.
टूटे हुए छप्पर के नीचे,टूटी हुई दीवाल मिट्टी की
उसी दरवाजे की चौखट पर बैठा एक बच्चा
का रहा है बात
रो रहा घर में है कोई,भूख के सूखे पड़े कुछ पत्र है
मै कह रहा हूं आप से चिकनी सतह पर ध्यान दो
°°°°
मंगलवार, 19 जून 2018
सुल्तान मोहित वाजपेयी के एक लघुकथा
ज़ंज़ीरे
नयी बहू आज पहली बार ब्याहकर ससुराल आयी थी..,बहुत सारा दहेज लेकर,सोना- चांदी,और बहुत सारी नोटों की गड्डियां..
दिन भर नयी बहू को देखेंने आने की औपचारिकता चलती रही नाते-रिश्तेदार आये,पास-पड़ोसी आये... दिन कटा...
रात को दूल्हा जा ही पाया था नयी बहु के पास की बाहर से आवाज आयी-"अरे छुटके जरा यहाँ तो आ..!देख तो कितना-कुछ लायी है..!"
दूल्हा कमरे के बाहर चला गया..!नयी बहू उससे कुछ कहना चाह रही थी..शायद..नही कह पायी..!
एक घंटा हो गया,और अब दो घंटे..?अचानक नयी बहू को हार्ट अटैक का जबर्दरस्त दौरा पड़ा..? उसकी आखिरी सासे सुहागरात की सेज पर ही अनन्त की और चल रही थी..!
उसने कई बार आवाज़ दी,पास बुलाने का भरभस प्रयास किया वो नही आये..?सारे लोग एक साथ बैठे बेटे , भाई ,भतीजे ,ऒर भांजे की शादी का जश्न मना रहे थे..और दहेज में मिली गड्डियों की नोटे गिन रहे थे..!
दूल्हे ने बीच-बीच कहा भी -माँ वो बुला रही है ..!शायद उसकी तबियत...?
"बस थोड़ा रुक..ये आखिरी गड्डी है..!"माँ ने कहा..!
मगर तब तक उसकी आखिरी सांस भी जा चुकी थी..!!
सुल्तान मोहित वाजपेयी की एक कविता
बेबसी
सात समुंदर पार का
एक महुए का पेड़
जिसकी कुछ पत्तियां समुन्दर की लहरों में
बहके आती हैं इधर
मदरसे में बच्चों को देखता
मदरसे के बाहर कांच बीनता बच्चा
जिसके अरमान बहके जाते है
मास्साब के ब्लैक बोर्ड तक
उसी तरह
जिसकी आंखों में , कभी
झाँककर नही देखा
परसो तालाब में डूब रहा था एक बच्चा
कह रहा था, चीख रहा था
बचाओ-बचाओ
किसी ने नही बचाया
सब जानते थे कि वो झूठ बोल रहा था
मगर अब वो वास्तव में डूब
चुका था,हमने देखा था..
उसकी आँखों मे दम तोड़ता सपना
जो अपना नाम दिन में पांच बार लिखता
साफ़-साफ़ ज़मीन पर
क्योकि उसने अब तक अपना नाम
लिखना ही सीखा था
फिर कलम की जगह
पकड़ा दिया गया एक बोरिया
काँच बीनने के लिए
डूबता हुआ,मदरसे में झांकता हुआ
बहके मास्साब के ब्लैक बोर्ड तक जाने के लिए
हमेसा , अनवरत.....
-सुल्तान मोहित वाजपेयी
डायरी
कितना सुरम्य बातावरण है ।आज सुबह जब मेरे घर पर शौचालय निर्माण का काम हो रहा था ।करीब दस बजे झमाझम बरसात होने लगी ।
शीतल पवन के झोके,मिटटी को तर कर रहे है।
सुबह जब सूरज उगता है,पेड़ संगीत के तरह गाने लगते है।
नदी जब माँजी को पुकारती है तब राते पलाश के पत्ते पर सवार होकर रेत पर सोने लगते है।
यह धीरे धीरे एक नयी सुबह की शुरुवात है।
धूप से सूखी दूब,नयी सड़क पर पहली बरसात में एकदम से ताज़ी हो गयी है और सड़के धुल कर साफ़ हो गयी है।
रात 12 बजे---
शांत है आकाश,धरती,
शांत है पाताल ,पानी,
शांत है वायु,कमल दल,शांत
शांत है काली घटाए,शांत
दूर उल्लू बोलता है
दूर जुगनो दीपदीपते,
शांत कोई गा रहा है
साखी कबीरा की,
शांत होकर शांत
गिर रही है बूँद पत्तो पर
शांत एकदम शांत
एक कविता पक रही है------
इस अँधेरे से मैं ऊब गया हूँ।चाहता हूँ क़ि एक ढिबरी को जला कर रख लूँ।
गीले बादल, आ कर काप गए है।
ओस गिर रही है
और मैं भी इस तरह से रात भर जग रहा हूँ।
- माध्यन्दिन
रात सो रही है
सघनता के बीच में
अँधेरा फैला है
अति बारीक महीन
उजला है आकाश अनन्त सा
नक्षत्र सो रहे है
नदी में ओढ़े नीला वर्ण
धरती सो रही है
पेड़ो पर सिर रख कर
अर्धरात्रि सघन है