दूर फेंक वैचारिकी, दूर फेंक साहित्य।
दरबारों की शान में, पीट तालियाँ नित्य।।
इनकी भी जयकार कर, उनकी भी जयकार।
चेहरे पर हरदम पहन, चेहरे कई हज़ार।।
टुकड़ों की उम्मीद में, धनपशुओं के बीच।
इसकी उसकी शान में, अपने शब्द उलीच।।
नंगे होने से मिले, यदि कोई सौगात।
नंगा हो जा फेंककर, कागज़, कलम, दवात।
लिख चालीसा, आरती, खण्ड काव्य दो-चार।
नंगे राजा को बता, ईश्वर का अवतार।।
इनके-उनके कक्ष में, तू ही सबसे दक्ष।
वक़्त पड़े तो पक्ष में, वक़्त पड़े प्रतिपक्ष।।
दरबारों के गीत लिख, लिख रावण को राम।
दो दो पैसे के लिए, कर खुद को नीलाम।।
पुरस्कार, सम्मान की, रख आँखों में प्यास।
जोड़-तोड़ का नित नया, रचता चल इतिहास।।
•जय चक्रवर्ती
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