बुधवार, 18 अक्टूबर 2023

रजनी शर्मा 'बस्तरिया' की एक कविता

बस्तर 

बस्तर से  लौटने वाले
अपने भीतर समेटे 
दोनो में भात,
 पत्तों में हवा,
 तुमा में पानी.........
 जंगल उनके भीतर 
आज भी हरा है
 बस्तर जाने वालों
 से पूछते हैं कि
 अब कैसा है?
 बस्तर...............
 मैं कुछ बोलती नही,
 रख देती हूं।
 उनकी हथेलियों में,
 एक अंजुरी माटी ,
बूंद भर पानी.........
 हवा खुद ब खुद
 आ जाती है और
 हथेलियों से
 बस्तर
पहुंच जाता है 
उनके भीतर.............
 
• रजनी शर्मा 'बस्तरिया'

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