गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

संताने

हम सब उस ईश्वर की संताने है
जिसने देश निकाला दिया धरती पर....

वह कौन सा अज्ञात दंड है
जो भोग रहा हूँ
चारो तरफ

वह कौन सा अंतहीन दुःख है
जो भोग रहा हूँ
दिन-प्रतिदिन

वह कौन सी अपूर्ण यात्रा है
जो बढ़ रही है
अज्ञात गंतब्य की ओर
पल-प्रतिपल

हम सब ईश्वर कु संताने है
कदाचित....

वे कौन से लोग है
अश्लील,पापी,निरंकुश,ढोंगी,छद्म
जो अपनी प्रजा को एक गृह युद्ध में रोपना चाहते है
ईश्वर के नाम पर

हे ईश्वर...सुन रहा है क्या?
हम सब ईश्वर की संताने है
फिर भी
    
        -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

गाँव की बेटी

गाँव की बेटी रहती है
गरीबी के बीच
छप्पर के नीचे 

गाँव की बेटी
खेत काटती है
हल जोतती है
चारा काटती है
दुध दुहती है
पानी भरती है
बर्तन माँजती है
रोटियाँ सेंकती है 
कँडे पाथती है
गन्ना छीलती है
गोबर उठाती है
छोटे भाईयों को खेलाती है
और गुह उठाती है
बाप की फटकार खाती है 
बड़े भाईयों की मार खाती है
और कभी - कभी पैदल जाती है
कस्बे के स्कूल भी समय निकाल कर 
माँ - बाप, भाई के लिए ,
इतना सब करने के बाद भी
बेटा  नहीं बन पाती हरगिज
गाँव की बेटी 

गाँव की बेटी
ब्याह दी जाती  है 
जैसे धान की  पेड़ी
फिर इतना सब करने लगती है
पति और अपने बच्चों के लिए !

         -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

इंतज़ार (दो)

तुम्हारी ढेर सारी बाते
और मेरा इंतज़ार
खुलता है.......
अंधरे में एक रोशन-दान की तरह
और इंतज़ार साये की तरह
लंबा होने लगता है
और मन में पिघलने लगती है-यादें
मोमबत्ती की तरह

तुम्हारे सारे ख़त.....जिसमे लिखा हैं
तुम्हारे प्यार
सुरक्षित है-तुम्हारा इंतज़ार

आआओगे तुम एक दिन ज़रूर।

                -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

नयापन

नयापन उतरता है
मौन को मुखरित करके
जंगल के किसी पेड़ पर
या फिर लोमड़ी की खाल में

नयापन रुकता हैं
वातायन की पीठ पर
पलस्तर खुरची दीवार पर
अज्ञात आकृति बन जाने पर
या फिर अगूंठा का निशान सा

नयापन नया बनता है
कई तरह के पत्तो से
ओश और बरसात की बूंदों से
पुरानेपन की रौदकर
दूसरी फसल की तरह
पहली हराई के बाद जैसे मिट्टी फूटती है
      
                     -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

वर्ग-भेद

मुसहर ईट पाथता है
ईट पकाता है
चूहा खाता  है

बनिया ईट बेचता है
मुनाफा कमाता है
माल खाता है।
         
                  -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

रंगो का भार

धरती का रंग हरा
चाँद का ठंढा सफ़ेद
तारो का रंग आँख की चमक
एक रंग भाषित होता निर्वात में

दूसरा रंग दूसरी दुनियां में अमर
बदलो का रंग होता है इंद्र -धनुष पर रुक
रंग उतरते है सूरज से रथ से
फूलो पर.....
तितलियों के परो पर.....
दूब-घास बनकर
गेहूं में स्वाद बनकर
धान के कच्चे दाने में दुद्धा सा सफ़ेद

रंगो का फूलो से अनुबंध है
और सुगंध के साथ यारी
तभी तो रंग जीवन में
सात तरह से प्रवेश करते है

अपना-अपना भार लेकर
              -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

इंतज़ार (एक)

सूखे गुलाब की तर
तुम्हारे सारे शिकवे -गिले
मेरी आंखों की नमी मे
दूर तक करते हैं तुम्हारा इंतजार

आओगे तुम एक दिन जरुर
उस पगडंडी पर
जिस पर फैली है
मेरी तन्हाई

आओगे तुम एक दिन जरुर
            -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'