हम सब उस ईश्वर की संताने है
जिसने देश निकाला दिया धरती पर....
वह कौन सा अज्ञात दंड है
जो भोग रहा हूँ
चारो तरफ
वह कौन सा अंतहीन दुःख है
जो भोग रहा हूँ
दिन-प्रतिदिन
वह कौन सी अपूर्ण यात्रा है
जो बढ़ रही है
अज्ञात गंतब्य की ओर
पल-प्रतिपल
हम सब ईश्वर कु संताने है
कदाचित....
वे कौन से लोग है
अश्लील,पापी,निरंकुश,ढोंगी,छद्म
जो अपनी प्रजा को एक गृह युद्ध में रोपना चाहते है
ईश्वर के नाम पर
हे ईश्वर...सुन रहा है क्या?
हम सब ईश्वर की संताने है
फिर भी
-सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'