नयापन उतरता है
मौन को मुखरित करके
जंगल के किसी पेड़ पर
या फिर लोमड़ी की खाल में
नयापन रुकता हैं
वातायन की पीठ पर
पलस्तर खुरची दीवार पर
अज्ञात आकृति बन जाने पर
या फिर अगूंठा का निशान सा
नयापन नया बनता है
कई तरह के पत्तो से
ओश और बरसात की बूंदों से
पुरानेपन की रौदकर
दूसरी फसल की तरह
पहली हराई के बाद जैसे मिट्टी फूटती है
-सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।