गाँव की बेटी रहती है
गरीबी के बीच
छप्पर के नीचे
गाँव की बेटी
खेत काटती है
हल जोतती है
चारा काटती है
दुध दुहती है
पानी भरती है
बर्तन माँजती है
रोटियाँ सेंकती है
कँडे पाथती है
गन्ना छीलती है
गोबर उठाती है
छोटे भाईयों को खेलाती है
और गुह उठाती है
बाप की फटकार खाती है
बड़े भाईयों की मार खाती है
और कभी - कभी पैदल जाती है
कस्बे के स्कूल भी समय निकाल कर
माँ - बाप, भाई के लिए ,
इतना सब करने के बाद भी
बेटा नहीं बन पाती हरगिज
गाँव की बेटी
गाँव की बेटी
ब्याह दी जाती है
जैसे धान की पेड़ी
फिर इतना सब करने लगती है
पति और अपने बच्चों के लिए !
-सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'
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