गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

गाँव की बेटी

गाँव की बेटी रहती है
गरीबी के बीच
छप्पर के नीचे 

गाँव की बेटी
खेत काटती है
हल जोतती है
चारा काटती है
दुध दुहती है
पानी भरती है
बर्तन माँजती है
रोटियाँ सेंकती है 
कँडे पाथती है
गन्ना छीलती है
गोबर उठाती है
छोटे भाईयों को खेलाती है
और गुह उठाती है
बाप की फटकार खाती है 
बड़े भाईयों की मार खाती है
और कभी - कभी पैदल जाती है
कस्बे के स्कूल भी समय निकाल कर 
माँ - बाप, भाई के लिए ,
इतना सब करने के बाद भी
बेटा  नहीं बन पाती हरगिज
गाँव की बेटी 

गाँव की बेटी
ब्याह दी जाती  है 
जैसे धान की  पेड़ी
फिर इतना सब करने लगती है
पति और अपने बच्चों के लिए !

         -सुमित वाजपेयी 'मध्यान्दिन'

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।